कड़वा सच ......

सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //

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Mohd Haneef "Ankur"


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वेनूर ज़िंदगी……… (ग़ज़ल)

Posted On: 24 Oct, 2015  
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कविता में

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पथ सृजित अपना करो….

Posted On: 9 Nov, 2014  
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Others social issues कविता में

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Posted On: 17 Jan, 2013  
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में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

हनीफ भाई, आपकी इस कविता के प्रत्येक शब्द से राष्ट्रप्रेम का ज्वालामुखी फूटता है जिसके प्रत्येक भाव को नमन.! यदि आप मुस्लिम हैं तो आप सच्चे मुस्लिम हैं जैसा कि होना चाहिए। हाँलाकि जब व्यक्ति अन्तर्मन से भारतीय होता है तब उसे हिन्दू मुस्लिम जैसे किसी टैग की आवश्यकता नहीं रहती किन्तु यह बात मैंने इसलिए लिखी क्योंकि नेट पर आए गए किसी न किसी बात पर मुस्लिम चिंतकों लेखकों द्वारा भारत के विरुद्ध आग उगली जाती रहती है। मुझे तब अपार कष्ट हुआ जब मैंने देखा कि ऐसे ही कई लेखक भारतीय सैनिकों की हत्या-सरकशी पर पाकिस्तान का पक्ष ले रहे थे.! खुद जागरण पर ही मैंने एक लेख देखा.... आप जैसे राष्ट्रप्रेमियों पर गर्व होता है। लेखन बनाए रखिए। मेरी तरफ से इस कविता के लिए 5 में से 5........

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

हनीफ जी, सलाम. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र किस तरह आज भीड़तंत्र और मजाक बन कर रहा गया है इसका सटीक अंकन आप ने किया है. आज हर किसी की आवाज सुनाई देती है बस आम आदमी की आवाज सुनाई नहीं देती. नेता सत्ता के भोग में लगें हैं, अधिकारिओं की कमर की अकड़ ढीली नहीं होती. ज़रा थाने में जाकर तो देखिये, आप को पता चल जाएगा लोक का तंत्र काम कर रहा है या उसके समानांतर इन सरकारी अधिकारिओं का कुतंत्र. लोकतंत्र में आम आदमी अपमानित हो रहा है, नेता लोग उसकी सुनते नहीं. कहने को लोकतंत्र है एक बेचारा भूख के कारण इस दुनियां से टहल गया !! दाने-दाने को भटका था, पर कोई न आया काम ! भरे- भरे सड़ रहे दोस्त के गेंहूँ से गोदाम !!. बेहतरीन पंक्तियाँ. हनीफ जी, बेहतरीन रचना के लिए आप को बधाई, और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी. कृपया 'AKSHAR' पर भी नजर डालें.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

हम अपनी समझ में सबको अपना समझते हैं 'अलीन' ये अलग बात है, सब मेरी समझ को गलत समझते हैं........इसलिए एक बार फिर कहूँगा आपको यह बड़ा-छोटा का चक्कर चोदिये क्योंकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. परन्तु मैं यह बात सबसे कहता भी नहीं हूँ..........पर आपके रचनाओ में भाव गजब के होते है वही भाव आपके अन्दर देखना चाहता हूँ ...................जिससे आप अभी कोशों दूर हैं.....कई बार पतिया चूका हूँ आपको....! आप दुनिया को अपनी आखों से देखिये और खुद को भी. अपनी क्षमताओ का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि .......समाज के लिए कीजिये पर उसके इच्छा के अनुसार नहीं बल्कि उसके जो हित में जो हो उसके अनुसार.................कोई भी मरीज कड़वी दावा नहीं पीना चाहता पर एक डाक्टर को उसे पिलाना ही पड़ता है ताकि उसका सही इलाज हो सके................और खुद भी उसे पीना पड़ता है.......! परन्तु एक डाक्टर अपने मरीज से कभी नफ़रत नहीं करता, भले ही एक मरीज उसे कुछ भी समझे............आशा करता हूँ कि आप मेरी बाते समझ गए होंगे.......आपको एक डाक्टर बनना है न कि एक मरीज................. हाँ यदि हम सचमुच किसी का सम्मान करते हैं तो उस व्यक्ति को संबोधन के समय उसका नाम लेना ही नहीं चाहिए....यह मेरा चिंतन है पता नहीं आपका गीता और कुरान क्या कहता है........... आपने बहुत जगह मेरे कमेन्ट में देखा होगा कि अभिवादन के साथ सम्बंधित का नाम नहीं लेता .......क्योंकि मैं विचारों और व्यक्ति के सम्मान विश्वास करता हूँ.....नाम के सम्मान में............और सम्मान दिखने कि चीज नहीं होती और न ही व्यापर की चीज. लोग कहते है कि सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा....यह कौन सी बात हुई...............मेरा तो मानना है कि किसी व्यक्ति को सम्मान और अपमान क्यों.............?क्या हम संतुलित नहीं रह सकते............ ? मैं नहीं समझता कि मैं आपसे बड़ा हूँ .................वैसे भी माना उसे जाता है जो इस दुनिया में न हो या फिर अदृश्य हो परन्तु यह दोनों ही परिस्थिति मुझपे लागु नहीं होती...............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

यही तो अहम्, आपको कहए जा रहा है आपको. लिखते कुछ और हैं और दिखाते कुछ और हैं.....मैं ज्ञानी, तू ज्ञानी, मेरा, सम्मान और तेरा सम्मान ....इससे ऊपर उठकर बात करेंगे आप ............................ और आप नफ़रत समझने औए समझने की बात करते हैं न..... संदीप जी, नमस्कार- Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा May 23, 2012 संदीप जी, नमस्कार- मैं अपने ब्लॉग पर किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं चाहता. आपने सरिता जी की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया व्यक्त की . आप अपने ब्लॉग पर भी तो प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते थे फिर आपने मेरे ब्लॉग पर आकर प्रतिक्रिया व्यक्त क्योँ की ? आपको एक बार पहले भी मैं आगाह कर चुका हूँ की आप अपना काम कीजिये और मुझे अपना काम करने दीजिये. कृपया बार- बार मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे टेंशन देने की कोशिश मत कीजियेगा. मैं ये भली-भांति जनता हूँ की तुम किस दर्जे के लेखक हो. इसलिए निवेदन कर रहा हूँ की फिर कभी इस तरह की बात मेरे ब्लॉग पर आकर मत करना.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपकी अन्य रचनाये भी पढ़ी. : "सय्याद ने कफस को रखा चमन के पास" रचना सीधी दिल से निकली प्रतीत होती है. इस पर की हुई मेरी प्रतिक्रिया कतिपय तकनीकी कारणों से पोस्ट नहीं हो सकी. आपका स्तर निसंदेह स्तरीय है. "जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !! और "प्रेम राग हर दिशा में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो !" इसके अतिरिक्त अन्य पंक्तिया इस भाव के आस पास नहीं ठहरती पर ये रचना तबकी है जब बारहवी में पढ़ते थे तो ये सराहनीय हो सकता है पर जब आज आपसे अच्छा मिलता है तो और अच्छे के आशा होती है. आप दिल से सोचते हो अच्छा करते हो, दिल लगाते हो अच्छा करते हो पर दिल पे ले लेते हो ये अच्छा नहीं करते हो.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

अंकुर जी आपकी रचना पढ़कर कुछ  सवाल  मन में उठ  रहें हैं। जब हमारा मन- मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि है तो फिर  हम  क्यों ईंटों के मंदिर, मस्जित और  गिरजाघर बनाते हैं। क्या क्या निराकार, विस्तृत से भी विस्तृत तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म खुदा उसमें हर सकता है। क्या हम  उससे बड़े हो गये हैं जो उसके लिये  घर बनाने लगे। काश  इन मंदिरों, मस्जिदों और  गिरजाघरों की  जगह हम  स्कूल, अस्पताल  तथा लोगों के रहने के लिये घर बनाते तो शायद खुदा अधिक  खुश  होता। मंदिर मस्जित बनाकर तो हम खुदा का अपमान करते हैं। आओ   इस पर कुछ  विचार करें। सुन्दर काव्यात्मक  रचना के लिये बधाई.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

हनीफ जी, चलिए अब बता भी दीजिये कि किस दर्जे का लेखक है संदीप........और आप किस दर्जे के हैं.....! आप बोल रहे हैं..... मैं नहीं कभी ऐसा लेखन करता हूँ की किसी भावनाएं आहत हो....आप कभी भी अपनी बात पर नहीं रह पते...आगे भी चलते हैं और पीछे भी....इससे पहिले भी आपको कई बार पकड़ चूका हूँ........! आप का दर्ज़ा किता हो महँ क्यों न हो एक sath सभी को सब्तुष्ट नहीं कर सकते. वैसे भी आपकी कहानी और कथनी में बहुत फर्क है........एक काम करिए...............जो आपके ब्लॉग की पञ्च लाइन उसे हटा दीजिये.... "सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //" सच कहना आपकी बस की बात नहीं है......कमेन्ट और तारीफ़ से अपना दर्ज़ा ऊँचा करने के लिए मान-सम्मान का व्यापर करते रहिये..........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

हनीफ़ जी नमस्कार,  "मैं ये भली-भांति जनता हूँ की तुम किस दर्जे के लेखक हो. इसलिए निवेदन कर रहा हूँ की फिर कभी इस तरह की बात मेरे ब्लॉग पर आकर मत करना." तुमने बता नहीं की तुमने ये ब्लॉग खरीद रखा है....मेरी भी तुमसे एक निवेदन है.....तुम अपना ब्लॉग हटा लो, क्योंकि अगर तुम लिखोगे और तुम्हारा ब्लॉग फीचर्ड होगा तो मुझे पढ़ना परेगा और पढ़ूँगा तो कमेंट भी करूँगा क्योंकि मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है......इसीलिए मित्र.....मेरी सलाह मानो या तो सार्वजनिक मंच पर लिखना बंद कर दो या फिर सच सुनने की हिम्मत रखो........कड़वा बोलने से डरते नहीं हो तो कड़वा सुनना भी सीखो......! बाँकी मैं तुम्हारी उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ.....! भगवान करे तुम जल्दी ही विश्व स्तर के कवि बनो वो रवीन्द्र नाथ की तरह तुम को भी नोबल पुरुस्कार मिले.....!

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जी, अब आपने सच स्वीकारा है......जो मैं देख रहा था. वह आपकी मुंह से सुनना चाहता था.....जी आप यूंह तरक्की करते रहिये क्योंकि मैं तो अपनी तरक्की करने के लिए लिखता ही नहीं हूँ....तो सवाल ही नहीं उठता मेरी तरक्की. अभी आपने जो बात स्वीकारा है वो अंतर करता है एक अच्छी रचना और एक अच्छे रचनाकार में.....क्योंकि एक रचनाकार अपनी तरक्की करने के लिए नहीं लिखता और जो ऐसा करता है वो रचनाकार नहीं होता......! पैसा , नाम और शोहरत कमाने से कोई साहित्यकार रचनाकार नहीं बन जायेगा.....! मैं यह भी जनता हूँ कि आने वाले दिनों में यह सब कुछ आपके पास होगा क्योंकि आपकी चाहत के साथ इसको पाने के लिए मेहनत भी है. और आने वाले दिनों में आज जो मेरे पास है वो भी नहीं रहेगा क्योंकि यह मेरी चाहत है और इसे पाने के लिए मेरी मेहनत भी......! बहुत समय पहिले यह सब पाने कि मेरी भी इच्छा थी और शायद इससे अधिक पाया भी हूँ....पर वह एक अलग उम्र थी मेरी. अब उससे आगे निकल आया हूँ....वैसे भी मानसिक और मौलिक विकास सतत होता रहना चाहिए. बिलकुल नदी की धारा की तरह...यदि तालाब के ठहरे हुए पानी की तरह जहाँ विचारधारा हुई वहां पत्थर फेकने पर विक्षोभ पैदा होना संभावित है ....यही कारण है कि जब हम अपने आप को अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं और कोई बुरा कह देता है तो हम उसी के भाषा में जवाब देकर अपनी सारी अच्छाई बुराई में तब्दील कर देते हैं या यूँ कहिये की हमारा असली चेहरा बाहर आ जाता है...वरना यहाँ अच्छा कौन है और बुरा कौन....सब कुछ हमारे ही तो अन्दर है....! तो फिर दिखावा क्यों..?

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जनाव अलीन जी, आलोचना से व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व में निखार आता है. अगर आप मेरी आलोचना कर रहे है. तो बहुत अच्छा कर रहे है. बैसे आपकी दोनों ही बातों में विरोधाभास है. एक तरफ तो आप कह रहे है की आप रचनाएँ तो निश्चित ही बहुत अच्छी करते हैं. और दूसरी बात आप कह रहे है की आप अच्छे रचनाकार नहीं है. हर चीज में दो नज़रिए होते है, एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक, आशावादी व्यक्ति हमेशा सकारात्मक नजरिये से देखता है और तरक्की करता है. निराशावादी व्यक्ति हमेशा नकारात्मक नजरिये से देखता है और जहाँ खड़ा है , वहीँ पर खड़ा रह जाता है. स्वयं में पूर्ण कोई नहीं होता और जो पूर्ण हो जाता है वह या तो संतो की श्रेणी आ जाता है या फिर उसे भगवान का दर्ज़ा प्राप्त हो जाता है.

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

जनाब हनीफ जी, आप मेरी राय पूछे थे सो मैंने अपनी राय रखी यदि मैं पूछा होता कि आप कैसे लिखे है फिर आप बोलते, "मैंने अपने हिसाब से सही लिखा है. " तब बात समझ में आती. बस यहाँ से शुरू होता हैं 'अलीन और अंकुर' में अंतर.....हाँ.....हाँ....हाँ.....! मुझे किसी की झूठी तारीफ़ पसंद नहीं है. हरेक आदमी अपनी नज़र में अच्छा लिखता है. ...चूँकि यह रचना आपकी नज़र में अच्छी है इसलिए आपके इस पोस्ट पर जो एक मात्र ५ स्टार दिख रहा है वो मेरा दिया हुआ.....यहाँ से शुरू होता है मुझमे और दूसरों में अंतर......!मैं यह नहीं कहता कि मैं औरों से अच्छा हूँ. परन्तु मैं खुद से बेहतर हूँ, यहाँ से शुरू होता है..अलीन और मुझमे अंतर.......बाकी तो मैं लोगो के एक-दो कमेन्ट से पूरा व्यक्तित्व भाप जाता हूँ.......मार्गदर्शन और मैं ....हाँ...हाँ......हाँ....! आप किसी भी प्रकार मेरी बैटन को लेकर गलतफहमी मत पालिएगा.....आप निश्चित ही बहुत अच्छी रचना करते हैं पर एक अच्छा रचनाकार नहीं हैं....दोनों ही दो बाते हैं....हाँ....हाँ.....हाँ...! अच्छा हम चलते हैं....गर्मी बढ़ गयी है थोडा पानी पीजिये मैं भी पानी पिता हूँ...!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

परम आदरणीय गुरु जी, सादर चरण स्पर्श- आज आपने मेरी २० साल पुरानी याद ताजा कर दी, आप में मुझे अपने विछुड़े हुए परम आदरणीय गुरु जी श्री रमेश पाल सिंह जी मिल गये हैं. आपके सानिध्य में रहकर मेरी कलम अब और बलवती हो जाएगी. कुंडली में आपने जो गलती बताई है वो सही है. इससे पहले मुझे ये ज्ञान नहीं था. परन्तु अब आपने बता दिया है तो मैं इस बात का पूरा ध्यान रखूँगा. आपको क्षमा प्रार्थना के साथ नहीं बल्कि डांटकर मुझे मेरी गलती बतानी चाहिए थी. मैंने आपको अपना गुरु मान लिया है. इसलिए अब मेरी काव्य तुर्टियों आपको ही मेरी मदद करनी है. गुरु जी एक बात और बता दीजिये , क्या आधे अक्षर को भी एक मात्रा के रूप में गिना जाता है ?

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

आदरणीय अंकुर जी, सादर ! बहुत सुन्दर कुण्डलियाँ ! परन्तु क्षमाप्रार्थना के साथ एक निवेदन है कि इसमें जिस शब्द से शुरू किया जाता है, उसी पर समाप्त भी किया जाता है ! आपने पहली कुंडली "माता" शब्द से शुरू की है तो अंत भी इसी शब्द पर होना चाहिए....... "माता इस संसार में, बच्चों की भगवान / खुद तो वो भूखी रहे, हमको दे पकवान // हमको दे पकवान, छांव आँचल की देती / देती ज्ञान अपार, कुछ भी हमसे न लेती // कहि अंकुर कविराय, माँ के क़दमों में जन्नत / जो रखे माँ का मान, पूर्ण उसी की मन्नत"" . "माता इस संसार में, बच्चों की भगवान / खुद तो वो भूखी रहे, हमको दे पकवान // हमको दे पकवान, छांव आँचल की देती / भरती ज्ञान अपार, नहीं कुछ हमसे लेती // कहि अंकुर कविराय, बहुत अद्भुत यह नाता धन्य-धन्य वे लोग, साथ में जिनके माता !"" आशा है आप नाराज नहीं होंगे ! सभी कुण्डलियाँ भाव से भरी हैं ! शुरू से "अन्त" तक ! हार्दिक बधाई !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

.................... कोख में थी तब सताया. आँख खोली तब सताया. बेटी बनी तब सताया. वधु बनी तब सताया. माँ बनी तब भी सताया. .. कोख से कब्र तक– जननी सताई जा रही है. सात फेरों से बंधी, भगिनी सताई जा रही है. .. बंद ये सारा हवश का खेल होना चाहिए. आत्मा का परमात्मा से मेल होना चाहिए. अंकुर जी ....बहुत सुन्दर मूलभाव ..सुन्दर सन्देश ..काश लोग होश में आ जाएँ विनाश न करें इस सृष्टि का ..इसका सदा ही पुरजोर विरोध होना चाहिए दानवों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए ...........सरकार शासन आँखें खोले कड़ी से कड़ी सजा शीघ्र मिले तो आनंद और आये .........ये दीप जो आप ने जलाया है इसमें सब और रौशनी डालें हाथ मिलाएं शुभ कामना............... आभार भ्रमर ५ थोड़ी मेहनत और शब्दों को हिंदी बनाते समय ध्यान दें जैसे ...............अट्टहास , दंग, रुदन , नोच डाले ,

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

कोख में थी तब सताया. आँख खोली तब सताया. बेटी बनी तब सताया. वधु बनी तब सताया. माँ बनी तब भी सताया. .. कोख से कब्र तक– जननी सताई जा रही है. सात फेरों से बंधी, भगिनी सताई जा रही है. .. बंद ये सारा हवश का खेल होना चाहिए. आत्मा का परमात्मा से मेल होना चाहिए. अंकुर जी ....बहुत सुन्दर मूलभाव ..सुन्दर सन्देश ..काश लोग होश में आ जाएँ विनाश न करें इस सृष्टि का ..इसका सदा ही पुरजोर विरोध होना चाहिए दानवों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए ...........सरकार शासन आँखें खोले कड़ी से कड़ी सजा शीघ्र मिले तो आनंद और आये .........ये दीप जो आप ने जलाया है इसमें सब और रौशनी डालें हाथ मिलाएं शुभ कामना............... आभार भ्रमर ५ थोड़ी मेहनत और शब्दों को हिंदी बनाते समय ध्यान दें जैसे ...............अट्टहास , दंग, रुदन , नोच डाले ,

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

भाई बाईस मेन (संदीप) जी नमस्कार. तुम्हारी तारीफ करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है. इस मंच पर आपने सारी मान मर्यादाओं को ताक में रखते हुए स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने के लिए आलोचना शुरू कर दी है. मैंने तुम्हारा background देख लिया है. अन्य रचनाकारों के साथ तुम्हारे बात करने के लहजे को तुम्हारे ब्लॉग में देखा है. तुमने सत्य को अभी ठीक से समझा ही नहीं है. सत्य की गहराई में जाओगे तो मेरी पंक्तियाँ भी समझ में आ जाएँगी और मेरी कविताओं का मतलब भी. बैसे मैं तुम्हें Reply करना चाह ही नहीं रहा था किन्तु तुम्हें ये बताना जरुरी समझा की इस मंच पर मर्यादाएं मायने रखती है न की अहम्. अहम् की काली कोठरी में से बाहर निकलो.

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

के द्वारा: Mohd Haneef "Ankur" Mohd Haneef "Ankur"

सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //--------------- "सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है" -----ये बात सिर्फ एक डरपोक ही कह सकता है......मुझे नहीं लगता हैं कि सत्य कहने के लिए हमे हिम्मत कि ज़रूरत होती है, सत्य इतना सुंदर है, कि कोई भी सरल हृदय व्यक्ति सहजता से इसे कह सकता है......हाँ झूठ को सच बना कर कहने के लिए हिम्मत की ज़रूरत होती है, और झूठ कड़वा होता है,,,,,सत्य और कड़वा ये हो ही नहीं सकता....ये तो ऐसे हो गया जैसे कोई कहे की कड़वी शहद.......हाँ एक बात है यदि सत्य को कहने वाले का हृदय साफ और शुद्ध न हो तो सत्य कड़वा हो जाता है,,,,लेकिन इसमे सत्य का कोई दोष नहीं है.....मुहम्मद अगर कव्वाली भी गाएँगे तो वो कुरान हो जाएगा......उस परम हृदय से जो भी निकलेगा वो कुरान ही होगा......पर कोई झूठा व्यक्ति कुरान भी गाएगा तो वो कव्वाली हो जाएगा.........और हाँ वो कड़वा भी होगा......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: anupammishra anupammishra

वाह...वाह...वाह... मंदिरों और मस्जिदों में तुम बना लो मोर्चे / और उस भगवन को साखी बनाकर, हाथ में संगीन लेकर कसम खाओ / अब नहीं हम पनपने देंगे अमन को, और हम महरूम कर देंगे बहारों से चमन को / लूट लो खुशियाँ ज़माने की, और तुम मत दूसरों को, चैन से जीने कभी दो / यह तुम्हारा “धर्म” है ? जो त्याग-सयता-स्नेह से कितना कलंकित हो गया है / साफ़ करलो बह रहा है खून, पानी की तरह इंसानियत का / पेड़ पर फल आ रहे है - यह तुम्हारे धर्म के विपरीत हैं, लाओ कुल्हाड़ा काट लो तरु को, न ले पाये छाया कोई भी , बह रहा है नीर क्यौं, क्यों चांदनी बरसी धरा पर ? सूर्य क्यौं आता ज़माने पर छिड़कने को उजाला ? धर्म का अनुरोध मानो- धर्म की तलवार जो लटकी हमारे शीश ऊपर , मैं उसी से दर रहा हूँ / लेखिनी भी कांपती है शब्द को मुंह से उगलते, भर गया आतंक चारों ओर कैसी वेदना है / हाथ में बारूद लेकर और कर बिस्फोट उसका, तू स्वयं अपने अनागत को विगत क्यों कर रहा है ? यह फकीरी धर्म लायेगा धरा पर स्वर्ग सुन्दर / देश भारत है यहाँ पूजा फकीरों की हुई है / हो रही है और होगी /

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: abhii abhii

के द्वारा: Ankur Ankur

के द्वारा: Ankur Ankur

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: Ankur Ankur




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