कड़वा सच ......

सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //

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ग़ज़ल : "सय्याद ने कफस को रखा चमन के पास"

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(Kafas)

जाने को हूँ बैचैन मैं, अपने सजन के पास !
सय्याद ने कफस को, रखा चमन के पास !!
.
गुलशन की महक मुझको अच्छी नहीं लगी,
रहना नहीं है मुझको ऐसी घुटन के पास !
.
महरूम हो गया हूँ, दुनियाँ की चमक से,
घर बन गया है देखो मेरा तपन के पास !
.
मैंने हसीन ख्वाव सजाया था आँख में,
खोली जो मैंने आँख तो पाया चुभन दे पास !
.
मैयत की मेरी दोस्तों तैयारियां करो,
अब ले चलो यहाँ से मुझको अमन के पास !
.
मैं तो चला गया हूँ दुनियाँ से बहुत दूर,
फरमान अपना रख दो चलती पवन के पास !
.
जब था कफस में कैद तो आये नहीं करीब,
अब रो रहे हो बैठकर मेरे कफ़न के पास !
.
जुल्मो-सितम से मुझको सताया गया बहुत,
दिल काट कर रखा गया मेरा अगन के पास !
.
दुनियाँ की ठोकरें मिलीं “अंकुर” तुझे बहुत,
राहत मिली, सुकूं मिला, रब के वतन के पास !
**************************************

सय्याद = शिकारी,    कफस = पिंजरा,     मैयत = अर्थी

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 23, 2012

    सरिता जी, सादर- आपसे निवेदन- कृपया मुझे आप इस मामले में न ही लायें तो बेहतर होगा. मैं इस मंच पर सौहार्द का वातावरण चाहता हूँ. व साफसुथरे लेखन को ही पड़ता हूँ. और नहीं कभी ऐसा लेखन करता हूँ की किसी भावनाएं आहत हो.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 23, 2012

    संदीप जी, नमस्कार- मैं अपने ब्लॉग पर किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं चाहता. आपने सरिता जी की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया व्यक्त की . आप अपने ब्लॉग पर भी तो प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते थे फिर आपने मेरे ब्लॉग पर आकर प्रतिक्रिया व्यक्त क्योँ की ? आपको एक बार पहले भी मैं आगाह कर चुका हूँ की आप अपना काम कीजिये और मुझे अपना काम करने दीजिये. कृपया बार- बार मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे टेंशन देने की कोशिश मत कीजियेगा. मैं ये भली-भांति जनता हूँ की तुम किस दर्जे के लेखक हो. इसलिए निवेदन कर रहा हूँ की फिर कभी इस तरह की बात मेरे ब्लॉग पर आकर मत करना.

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    हनीफ़ जी नमस्कार,  “मैं ये भली-भांति जनता हूँ की तुम किस दर्जे के लेखक हो. इसलिए निवेदन कर रहा हूँ की फिर कभी इस तरह की बात मेरे ब्लॉग पर आकर मत करना.” तुमने बता नहीं की तुमने ये ब्लॉग खरीद रखा है….मेरी भी तुमसे एक निवेदन है…..तुम अपना ब्लॉग हटा लो, क्योंकि अगर तुम लिखोगे और तुम्हारा ब्लॉग फीचर्ड होगा तो मुझे पढ़ना परेगा और पढ़ूँगा तो कमेंट भी करूँगा क्योंकि मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है……इसीलिए मित्र…..मेरी सलाह मानो या तो सार्वजनिक मंच पर लिखना बंद कर दो या फिर सच सुनने की हिम्मत रखो……..कड़वा बोलने से डरते नहीं हो तो कड़वा सुनना भी सीखो……! बाँकी मैं तुम्हारी उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ…..! भगवान करे तुम जल्दी ही विश्व स्तर के कवि बनो वो रवीन्द्र नाथ की तरह तुम को भी नोबल पुरुस्कार मिले…..!

    May 25, 2012

    हनीफ जी, चलिए अब बता भी दीजिये कि किस दर्जे का लेखक है संदीप……..और आप किस दर्जे के हैं…..! आप बोल रहे हैं….. मैं नहीं कभी ऐसा लेखन करता हूँ की किसी भावनाएं आहत हो….आप कभी भी अपनी बात पर नहीं रह पते…आगे भी चलते हैं और पीछे भी….इससे पहिले भी आपको कई बार पकड़ चूका हूँ……..! आप का दर्ज़ा किता हो महँ क्यों न हो एक sath सभी को सब्तुष्ट नहीं कर सकते. वैसे भी आपकी कहानी और कथनी में बहुत फर्क है……..एक काम करिए……………जो आपके ब्लॉग की पञ्च लाइन उसे हटा दीजिये…. “सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया “अंकुर” ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //” सच कहना आपकी बस की बात नहीं है……कमेन्ट और तारीफ़ से अपना दर्ज़ा ऊँचा करने के लिए मान-सम्मान का व्यापर करते रहिये……….!

Mohinder Kumar के द्वारा
May 22, 2012

हनीफ़ जी मुहब्बत, जुदाई, लाचारगी और मिलन की चाहत के रंग समेटे दिलकश गजल… लिखते रहिये

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 23, 2012

    मोहिंदर जी, आपका हार्दिक आभार……………….

pawansrivastava के द्वारा
May 21, 2012

वाह वाह हनीफ भाई ! आपके ग़ज़ल को पढ़ कर खुद से मुक़र्रर की गुज़ारिश कर रहा हूँ ……. ‘जाने को हूँ बैचैन मैं, अपने सजन के पास ! सय्याद ने कफस को, रखा चमन के पास !! गुलशन की महक मुझको अच्छी नहीं लगी, रहना नहीं है मुझको ऐसी घुटन के पास !’ खास कर इन चार लाइनों का तो जबाब नहीं इस तरह का कुछ भी लिखें तो मुझे ज़रूर इत्तिला करें …

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 23, 2012

    पवन श्रीवास्तव जी, सादर- हौंसला अफजाई के लिए शुक्रिया………………………………. ग़ज़लें तो अब तक बहुत सी लिख चुका हूँ. किन्तु पोस्ट केवल एक ही की है. आगे जब भी ग़ज़ल पोस्ट करूँगा तो आपको सूचित जरुर करूँगा.

dineshaastik के द्वारा
May 21, 2012

वाह अंकुर जी वाह….. वह ही सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति,,, मुझे गजलें बहुत पसंद हैं, मेरा मानना है कि कविता लिखना आसान है लेकिन गजल लिखना बहुत ही कठिन है। बधाई……

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 23, 2012

    आदरणीय आस्तिक जी, सादर- आपको ग़ज़ल पसंद आई , मुझे अच्छा लगा. आपका आभार………………………………..

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 20, 2012

TESTING

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 20, 2012

    कैद में है मैना और सैयाद मुस्कराए इस बात को तो सभी ने सुन रखा है लेकिन आपने बुलबुल के हसबैंड की व्यथा कथा को बहुत ही बढ़िया ढंग से पेश किया है मुबारकबाद कबूल फरमाए

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 20, 2012

    राजकमल शर्मा जी, सादर- आपका हार्दिक आभार…………………… हौंसला अफजाई के लिए पुनः आभार………….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 20, 2012

    हनीफ भाई, नमस्कार गुरुदेव के स्वर का बहुत अर्थ है मैं भी उनकी बातों के साथ हो लेता हूँ सुन्दर गजल अति सुन्दर

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 20, 2012

    आदरणीय आनंद प्रवीण जी, सादर नमस्कार- आपने भी श्री राजकमल जी के स्वर से स्वर मिलाया मुझे अच्छा लगा. आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका ह्रदय से आभार…………………………………….

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 20, 2012

जब था कफस में कैद तो आये नहीं करीब, अब रो रहे हो बैठकर मेरे कफ़न के पास ! खूबसूरत शब्द………. खूबसूरत रचना……..

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 20, 2012

    पियूष पन्त जी, सादर- आपका आभार……………………. आपने रचना की सराहना की………………

hina के द्वारा
May 19, 2012

सर जी, वाह…………..वाह……………………वाह………………..

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 20, 2012

    हिना, धन्यबाद………………………………..

shashibhushan1959 के द्वारा
May 19, 2012

मान्यवर अंकुर जी, सादर ! सुन्दर रचना ! निर्दोष ! भाव भी बहुत अच्छे ! हार्दिक धन्यवाद !

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 19, 2012

    आदरणीय गुरु जी, सादर नमन- आपका हार्दिक आभार…………………………………..

follyofawiseman के द्वारा
May 19, 2012

If, for example, we wanted to express what we now write as ‘(x) . fx’ by putting an affix in front of ‘fx’–for instance by writing ‘Gen. fx’–it would not be adequate: we should not know what was being generalized. If we wanted to signalize it with an affix ‘g’–for instance by writing ‘f(xg)’–that would not be adequate either: we should not know the scope of the generality-sign. If we were to try to do it by introducing a mark into the argument-places–for instance by writing ‘(G,G) . F(G,G)’ –it would not be adequate: we should not be able to establish the identity of the variables. And so on. All these modes of signifying are inadequate because they lack the necessary mathematical multiplicity.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 19, 2012

    संदीप जी, अगर आप अपने विचार हिंदी में व्यक्त करें तो समझने में आसानी होगी………………..

minujha के द्वारा
May 18, 2012

बेबसी और दर्द   को अच्छे शब्द  दिएं हैं आपनेअंकुर जी

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    मीनू झा जी, आपका हार्दिक आभार……………………………

चन्दन राय के द्वारा
May 18, 2012

अंकुर भाई , आपका शायराना अंदाज खिंच लाया हमे आपके पास , महरूम हो गया हूँ, दुनियाँ की चमक से, घर बन गया है देखो मेरा तपन के पास ! .बहुत बेहतरीन मित्र

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    मित्र चन्दन जी, आपका ह्रदय से आभारी हूँ…………………………

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 18, 2012

मैयत की मेरी दोस्तों तैयारियां करो, अब ले चलो यहाँ से मुझको अमन के पास ! बहुत खूब, बधाई.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय कुशवाहा सर, सादर नमन- ग़ज़ल पर आपका आशीर्वाद मिला बहुत ख़ुशी हुई………………………………… आपका ह्रदय से आभारी हूँ………….

mparveen के द्वारा
May 17, 2012

हनीफ जी नमस्कार, बहुत सुंदर भावों से युक्त ग़ज़ल के लिए बधाई ….. जब था कफस में कैद तो आये नहीं करीब, अब रो रहे हो बैठकर मेरे कफ़न के पास !

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 17, 2012

    बड़ी बहिन परवीन जी, यथोचित अभिवादन- आज मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि आप मेरे ब्लॉग पर आयीं और मुझे आशीर्वाद दिया. ग़ज़ल को आपने पड़ा और सराहा इसके लिए ह्रदय से आपका आभार व्यक्त करता हूँ. आशा करता हूँ कि आप मेरे पिछले पोस्ट जरुर देखेंगी.

sinsera के द्वारा
May 17, 2012

आज आपकी कविता में निराशा के अंकुर क्यूँ दिख रहे हैं भाई…..

    May 17, 2012

    दीदी. अंकुर जी मेरी दर्द भरी कहानी पढ़कर दर्द में चले गए हैं और कोई बात नहीं हैं……..हाँ….हाँ….हाँ…!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 17, 2012

    आदरणीया सरिता जी, सादर- अनिल जी ने जो कहा वही सही है. क्यूंकि इनकी आप बीती कहानी पढकर ही इस ग़ज़ल का उदगार हुआ है. बैसे मेरी ज़िन्दगी की कहानी भी कुछ इन्ही की तरह है.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 17, 2012

    जनाव अलीन जी, बैसे आप बताइए कि आपको ग़ज़ल कैसी लगी.

    May 17, 2012

    ईमानदारी से बोलू तो कई जगह इस ग़ज़ल की पक्तियां बिखरती हुई प्रतीत हुई है……जो भाव देने की कोशिश किये है उसमे पूर्ण रूप से आप नाकाम हुए हैं…….मुझे नहीं पता की ग़ज़ल लेखन कैसे किया जाता है फिर भी मैं अधिकतर ग़ज़ल और शेर ही लिखता हूँ…और वो भी अपनी शैली में….कभी मौका मिलेगा तो जरुर दिखूंगा कि ग़ज़ल में क्या भाव होने चाहिए……! हाँ आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ….मेरी कहानी न मेरी तरह हो सकती है और न ही आपकी कहानी मेरी तरह …….न अलीन, अंकुर हो सकता है और न ही अंकुर, अलीन….! शायद यह मेरी बात आपको अभी समझ में न आये…….क्योंकि कुछ चीजो को समझने के लिए वक्त से होकर गुजरना होता है….!

    May 17, 2012

    ईमानदारी से बोलू तो कई जगह इस ग़ज़ल की पक्तियां बिखरती हुई प्रतीत हुई है……जो भाव देने की कोशिश किये है उसमे पूर्ण रूप से आप नाकाम हुए हैं…….मुझे नहीं पता की ग़ज़ल लेखन कैसे किया जाता है फिर भी मैं अधिकतर ग़ज़ल और शेर ही लिखता हूँ…और वो भी अपनी शैली में….कभी मौका मिलेगा तो जरुर दिखाऊंगा कि ग़ज़ल में क्या भाव होने चाहिए……! हाँ आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ….मेरी कहानी न आपकी तरह हो सकती है और न ही आपकी कहानी मेरी तरह …….न अलीन, अंकुर हो सकता है और न ही अंकुर, अलीन….! शायद यह मेरी बात आपको अभी समझ में न आये…….क्योंकि कुछ चीजो को समझने के लिए वक्त से होकर गुजरना होता है….!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 17, 2012

    अनिल जी, हो सकता है की आपको मेरी ग़ज़ल के भाव बिखरते हुए लग रहे हो. किन्तु मैंने अपने हिसाब से सही लिखा है. और फिर अपना- अपना नजरिया होता है. मुझे आपकी किसी भी बात से कोई मलाल नहीं है न ही बुरा लगा है. मैं आपकी एक बात से सहमत हूँ. “न ही अंकुर अलीन हो सकता है…………. और न ही अलीन अंकुर हो सकता है. उचित मार्गदर्शन के लिए साधुवाद !

    May 17, 2012

    जनाब हनीफ जी, आप मेरी राय पूछे थे सो मैंने अपनी राय रखी यदि मैं पूछा होता कि आप कैसे लिखे है फिर आप बोलते, “मैंने अपने हिसाब से सही लिखा है. ” तब बात समझ में आती. बस यहाँ से शुरू होता हैं ‘अलीन और अंकुर’ में अंतर…..हाँ…..हाँ….हाँ…..! मुझे किसी की झूठी तारीफ़ पसंद नहीं है. हरेक आदमी अपनी नज़र में अच्छा लिखता है. …चूँकि यह रचना आपकी नज़र में अच्छी है इसलिए आपके इस पोस्ट पर जो एक मात्र ५ स्टार दिख रहा है वो मेरा दिया हुआ…..यहाँ से शुरू होता है मुझमे और दूसरों में अंतर……!मैं यह नहीं कहता कि मैं औरों से अच्छा हूँ. परन्तु मैं खुद से बेहतर हूँ, यहाँ से शुरू होता है..अलीन और मुझमे अंतर…….बाकी तो मैं लोगो के एक-दो कमेन्ट से पूरा व्यक्तित्व भाप जाता हूँ…….मार्गदर्शन और मैं ….हाँ…हाँ……हाँ….! आप किसी भी प्रकार मेरी बैटन को लेकर गलतफहमी मत पालिएगा…..आप निश्चित ही बहुत अच्छी रचना करते हैं पर एक अच्छा रचनाकार नहीं हैं….दोनों ही दो बाते हैं….हाँ….हाँ…..हाँ…! अच्छा हम चलते हैं….गर्मी बढ़ गयी है थोडा पानी पीजिये मैं भी पानी पिता हूँ…!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    जनाव अलीन जी, आलोचना से व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व में निखार आता है. अगर आप मेरी आलोचना कर रहे है. तो बहुत अच्छा कर रहे है. बैसे आपकी दोनों ही बातों में विरोधाभास है. एक तरफ तो आप कह रहे है की आप रचनाएँ तो निश्चित ही बहुत अच्छी करते हैं. और दूसरी बात आप कह रहे है की आप अच्छे रचनाकार नहीं है. हर चीज में दो नज़रिए होते है, एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक, आशावादी व्यक्ति हमेशा सकारात्मक नजरिये से देखता है और तरक्की करता है. निराशावादी व्यक्ति हमेशा नकारात्मक नजरिये से देखता है और जहाँ खड़ा है , वहीँ पर खड़ा रह जाता है. स्वयं में पूर्ण कोई नहीं होता और जो पूर्ण हो जाता है वह या तो संतो की श्रेणी आ जाता है या फिर उसे भगवान का दर्ज़ा प्राप्त हो जाता है.

    May 18, 2012

    जी, अब आपने सच स्वीकारा है……जो मैं देख रहा था. वह आपकी मुंह से सुनना चाहता था…..जी आप यूंह तरक्की करते रहिये क्योंकि मैं तो अपनी तरक्की करने के लिए लिखता ही नहीं हूँ….तो सवाल ही नहीं उठता मेरी तरक्की. अभी आपने जो बात स्वीकारा है वो अंतर करता है एक अच्छी रचना और एक अच्छे रचनाकार में…..क्योंकि एक रचनाकार अपनी तरक्की करने के लिए नहीं लिखता और जो ऐसा करता है वो रचनाकार नहीं होता……! पैसा , नाम और शोहरत कमाने से कोई साहित्यकार रचनाकार नहीं बन जायेगा…..! मैं यह भी जनता हूँ कि आने वाले दिनों में यह सब कुछ आपके पास होगा क्योंकि आपकी चाहत के साथ इसको पाने के लिए मेहनत भी है. और आने वाले दिनों में आज जो मेरे पास है वो भी नहीं रहेगा क्योंकि यह मेरी चाहत है और इसे पाने के लिए मेरी मेहनत भी……! बहुत समय पहिले यह सब पाने कि मेरी भी इच्छा थी और शायद इससे अधिक पाया भी हूँ….पर वह एक अलग उम्र थी मेरी. अब उससे आगे निकल आया हूँ….वैसे भी मानसिक और मौलिक विकास सतत होता रहना चाहिए. बिलकुल नदी की धारा की तरह…यदि तालाब के ठहरे हुए पानी की तरह जहाँ विचारधारा हुई वहां पत्थर फेकने पर विक्षोभ पैदा होना संभावित है ….यही कारण है कि जब हम अपने आप को अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं और कोई बुरा कह देता है तो हम उसी के भाषा में जवाब देकर अपनी सारी अच्छाई बुराई में तब्दील कर देते हैं या यूँ कहिये की हमारा असली चेहरा बाहर आ जाता है…वरना यहाँ अच्छा कौन है और बुरा कौन….सब कुछ हमारे ही तो अन्दर है….! तो फिर दिखावा क्यों..?

    May 18, 2012

    yadi aapko aalochana pasand hai to pasand kariye na fir sunane ki jarurat kya…haa… haa…haa …. ek baat aur maaf kariyega is sansar men ishwar ke alawa koi purn nahi…yahan tak ki sant bhi nahi…!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    अलीन जी, सच को मैंने नकारा कब था………………….. कविता लिखना मेरा शौक है. इसे मैंने अपना व्यवसाय नहीं बनाया है. और नहीं कभी बनाऊंगा. मेरी कोशिश तो बस ये है की मेरी कविताओं से लोगों में जाग्रति पैदा हो और एक ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमे- भाईचारा, अमन, सौहार्द, देश-प्रेम, नैतिकता, आदि हो जिससे हमारा देश का भविष्य उज्जवल होगा.

    May 18, 2012

    हाँ….हाँ…हाँ….!

nishamittal के द्वारा
May 17, 2012

अंकुर जी रचना आपकी भावपूर्ण लगी परन्तु कृपया उर्दू शब्दों के अर्थ साथ में दें तो सबको भाव पूर्णतया स्पष्ट होगा

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 17, 2012

    आदरणीया दीदी जी, सादर नमन- आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ. उर्दू के शब्दों की हिंदी मैंने पोस्ट पर एडिट कर दी है.

    akraktale के द्वारा
    May 18, 2012

    अंकुर जी नमस्कार, मैं तो चला गया हूँ दुनियाँ से बहुत दूर, फरमान अपना रख दो चलती पवन के पास ! बहुत ही सुन्दर गजल. बधाई. अच्छा किया आपने उर्दू के शब्दों का हिंदी अर्थ लिख दिया है. आजकल जिस तरह से मंच पर अंग्रेजी और उर्दू का उपयोग हो रहा है लगता है दोनों की डिक्शनरी साथ लेकर ही बैठना पडेगा.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 18, 2012

    आदरणीय भाई साहब, आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका ह्रदय से आभार………………….


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