कड़वा सच ......

सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //

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गीत : मन मंदिर में पूजा हो

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जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

तन्हाई की कब्रों में अब,

दफ़्न हुए सारे अरमां !

दम निकले उसकी बाँहों में,

घर में जिसके पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

पंकज पथिक प्रेम का मारा,

अथाह नीर में कुम्हलाया !

नैवेद्य- पात्र में उसे सजा लो,

जब भी कोई पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

अस्तित्व हीन पंकज पूजा बिन,

पंकज बिन सूनी पूजा !

खो जाओ एक दूजे में तुम,

जहाँ भी पावन पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

कीचड़ का वो रहने वाला,

तूं देवों की है दासी !

एक राह के दोनों राही,

तुम दोनों ही पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे,

हो जाये जग मतवाला !

“अंकुर” की बस अर्ज़ यही है,

घर-घर प्रेम की पूजा हो !

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो !

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!

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68 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
July 1, 2012

आदरणीय अंकुर जी, सादर ! क्या यह रचना किसी वर-वधू के लिए लिखी गई है ? रचना बहुत अच्छी बनी है ! हार्दिक बधाई !

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    July 3, 2012

    आदरणीय गुरु जी, बिल्कुत ठीक पहचाना आपने, ये कविता एक प्रेमी युगल के लिए ही लिखी गई थी.

manu shrivastav के द्वारा
June 4, 2012

मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !! बहुत सुन्दर रचना , कहा भी गया है की मन चंगा तो कठोती में गंगा

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 5, 2012

    मनु श्रीवास्तव जी, रचना आपको पसंद आई, आपका आभार………………………….. बस इसी प्रकार सहयोग बनाये रखें……………………

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 2, 2012

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो ! जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !! प्रभु ऐसी ..अंकुर की विचार धारा वाले अनेकों लोगों को अवतरित करें उन्हें सफल करे ..जन जन में स्नेह भरे मानवता की पूजा हो सब अपने हों नहीं कोई भी दूजा हो … बहुर सुन्दर बधाई भ्रमर ५

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 3, 2012

    आदरणीय सुरेन्द्र शुक्ल जी, रचना पर आपका स्नेह और समर्थन मिला. आपका आभारी हूँ.

swadha के द्वारा
June 2, 2012

बहुत सुन्दर और कोई भी लेखक कभी छोटा नहीं होता सबकी भावनाओं कि एक सी ही अहमियत होती है |

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 3, 2012

    स्वधा जी, आपको रचना अच्छी लगी, और आपने मुझे अपना समर्थन दिया, आपका ह्रदय से आभार……………… बस इसी प्रकार समर्थन बरक़रार रखें……………….

panditsameerkhan के द्वारा
June 1, 2012

हनीफ जी बस मन मंदिर में ही पूजा हो वही ज्यादा अच्छा है….प्रेम राग हर दिशि में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो ! बहुत सुन्दर विचार हैं….

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 3, 2012

    समीर जी, रचना पर आपका समर्थन मिला, अत्यंत प्रसन्नता हुई, आपका आभारी हूँ. आगे भी समर्थन का सिलसिला बरक़रार रखेंगे, आशा करता हूँ.

May 31, 2012

भाई जी मैं भी मोहिंदर जी वाला सवाल दोहरा रहा हूँ….ये पूजा जी कौन हैं……..सही-सही बताईयेगा….

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 1, 2012

    कुमार गौरव जी, नमस्कार- आपका सवाल उचित है……आज से बीस साल पहले ये पूजा मेरे मित्र पंकज की प्रेमिका थी. मेरे मित्र ने अपनी प्रेमिका को आकर्षित करने के लिए मुझसे ये गीत लिखवाया था. मेरे इस गीत ने पूजा की मानसिकता पर इतनी गहरी छाप छोड़ी की वे दोनों हमेशा हमेशा के लिए परिणय सूत्र में बंध गए. और मेरा ये गीत सार्थक हो गया.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 30, 2012

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो ! अति सुन्दर भाव, पंकज. बधाई.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर, सादर नमन- मेरी भावनाओं को समझते हुए आपने प्रतिक्रिया व्यक्त की…………………… आपका आभार……………

Mohinder Kumar के द्वारा
May 30, 2012

हनीफ़ जी, प्रेम अभिभूत भावनाओं से ओतप्रोत रचना के लिये बधाई… एक संशय है… ये पूजा… पूजा वाली पूजा है या फ़िर आपकी वाली पूजा है ? ;)

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीय मोहिंदर जी, सादर- रचना पर प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार………………………. ये पूजा दोनों वाली पूजा है…………. आप जिस नजरिये देखेंगे ये बैसी ही हो जाएगी.

alkargupta1 के द्वारा
May 30, 2012

अंकुर जी , बहुत ही सुन्दर भावनाओं से ओत-प्रोत मनोहारी गीत की रचना के लिए बधाई

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 31, 2012

    परम आदरणीया मैम, सादर नमन- रचना पर आपका आशीर्वाद मिला, बहुत ख़ुशी हुई………………. बस इसी प्रकार मनोवल बढाती रहें तो कृपा होगी.

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
May 27, 2012

अंकुर जी नमस्कार बहुत ही सुन्दर भावनाओं के साथ लिखी हुयी संदेश-प्रद कविता बधाई…

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय अजय कुमार जी, सादर नमस्कार- गीत पर आपका समर्थन मिला, आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 26, 2012

अंकुर जी, नमस्कार ! अच्छी गीतिक रचना के लिए बधाई ! महिमा जी ने चोरी की रचना के सम्बन्ध कुछ सवाल छोड़े हैं ,कृपया मेरे ब्लौग पर देखें ! पुनश्च !!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय विजय गुंजन जी, सादर नमस्कार- गीत पर आपका समर्थन मिला, आपका हार्दिक आभार. आपके ब्लॉग पर महिमा जी के चोरी की रचनाओं के सम्बन्ध में सवाल जरुर देखूगा.

akraktale के द्वारा
May 26, 2012

अंकुर जी नमस्कार, पंकज पथिक प्रेम का मारा, अथाह नीर में कुम्हलाया ! नैवेद्य- पात्र में उसे सजा लो, जब भी कोई पूजा हो ! बहुत सुन्दर भावनाओं के साथ लिखी आपकी सुन्दर रचना घर घर प्रेम जी पूजा का सन्देश. बधाई. किन्तु पंकज हर पूजा में शामिल नहीं हो सकता पंडित जी नाराज हो जायेंगे या शायद इश्वर भी.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय भाई साहब, सादर नमन- सही कहा आपने की पंकज हर पूजा में शामिल नहीं हो सकता. ये रचना आज से बीस साल पहले लिखी गई थी तब मुझे ये बात मालूम नहीं थी. किन्तु इस गीत को लिखने का उद्देश्य कुछ अलग था इसलिय मैंने इसमें गलती को सुधारना उचित नहीं समझा. आपने समर्थन दिया आपका हार्दिक आभार.

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय अनिल कुमार जी, सादर नमस्कार- सत्य प्रकाश जी की पोस्ट देखने के बाद मैं अपनी राय व्यक्त करूँगा. आपका हार्दिक आभार….

    May 27, 2012

    आदरणीय लगाकर मुझ्व गली मत दीजिये…सिर्फ अनिल जी से ही काम चलेगा या फिर अनिल से……………!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 28, 2012

    अनिल, अगर आपको सम्मान सूचक शब्दों से परहेज है तो , अब मैं आपको सिर्फ अनिल से ही संबोधित करूँगा. मैंने सत्य प्रकाश जी का आलेख पड़ लिया है.

    May 30, 2012

    ये हुई न बात…………………..!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 31, 2012

    लेकिन आपका नाम डायरेक्ट लेने में मुझे बहुत असहज महसूस हो रहा है.

    May 31, 2012

    हाँ…..हाँ..हाँ………………..भाई सचमुच का मुझे कुत्ता समझ लिए हैं क्या….? मैं भी आदमी और आप भी आदमी तो एक आदमी को दुसरे आदमी को नाम से पुकारने में………………….असहजता कैसी…!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 1, 2012

    भारतीय संस्कृति और नैंतिकता सामने आ रही है. इसलिए मुझे आपका नाम लेने में असहजता महसूस हो रही है. आप एक वुद्धिजीवी व्यक्ति है. जबकि कुत्ता एक जानवर होता है. माना की वह वफादार होता है. स्वामी भक्त होता है, लेकिन आदमी जैसा नहीं हो सकता है. अगर आप ये सोच रहे है की मैंने आपको कुत्ता समझ लिया है तो ये बिलकुल गलत है. आप मेरे लिए पहले भी सम्माननीय थे और आज भी है. एसी बात दुबारा मत कहियेगा, मेरी आत्मा को चोट पहुँचती है. और मुझे अपने नाम के आगे आदरणीय, व बाद में जी लगाने की अनुमति प्रदान कीजियेगा. आपका छोटा भाई- मोहम्मद हनीफ “अंकुर”

    June 1, 2012

    हम अपनी समझ में सबको अपना समझते हैं ‘अलीन’ ये अलग बात है, सब मेरी समझ को गलत समझते हैं……..इसलिए एक बार फिर कहूँगा आपको यह बड़ा-छोटा का चक्कर चोदिये क्योंकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. परन्तु मैं यह बात सबसे कहता भी नहीं हूँ……….पर आपके रचनाओ में भाव गजब के होते है वही भाव आपके अन्दर देखना चाहता हूँ ……………….जिससे आप अभी कोशों दूर हैं…..कई बार पतिया चूका हूँ आपको….! आप दुनिया को अपनी आखों से देखिये और खुद को भी. अपनी क्षमताओ का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि …….समाज के लिए कीजिये पर उसके इच्छा के अनुसार नहीं बल्कि उसके जो हित में जो हो उसके अनुसार……………..कोई भी मरीज कड़वी दावा नहीं पीना चाहता पर एक डाक्टर को उसे पिलाना ही पड़ता है ताकि उसका सही इलाज हो सके…………….और खुद भी उसे पीना पड़ता है…….! परन्तु एक डाक्टर अपने मरीज से कभी नफ़रत नहीं करता, भले ही एक मरीज उसे कुछ भी समझे…………आशा करता हूँ कि आप मेरी बाते समझ गए होंगे…….आपको एक डाक्टर बनना है न कि एक मरीज…………….. हाँ यदि हम सचमुच किसी का सम्मान करते हैं तो उस व्यक्ति को संबोधन के समय उसका नाम लेना ही नहीं चाहिए….यह मेरा चिंतन है पता नहीं आपका गीता और कुरान क्या कहता है……….. आपने बहुत जगह मेरे कमेन्ट में देखा होगा कि अभिवादन के साथ सम्बंधित का नाम नहीं लेता …….क्योंकि मैं विचारों और व्यक्ति के सम्मान विश्वास करता हूँ…..नाम के सम्मान में…………और सम्मान दिखने कि चीज नहीं होती और न ही व्यापर की चीज. लोग कहते है कि सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा….यह कौन सी बात हुई……………मेरा तो मानना है कि किसी व्यक्ति को सम्मान और अपमान क्यों………….?क्या हम संतुलित नहीं रह सकते………… ? मैं नहीं समझता कि मैं आपसे बड़ा हूँ ……………..वैसे भी माना उसे जाता है जो इस दुनिया में न हो या फिर अदृश्य हो परन्तु यह दोनों ही परिस्थिति मुझपे लागु नहीं होती……………!

    June 1, 2012

    कृपया छोड़िये पढ़े……….! बेहतर होगा यदि आप एडिट कमेन्ट में जाकर उस शब्द को “छोड़िये” कर दे………..!

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    June 3, 2012

    जनाव मैं आपकी बात से सहमत हूँ………………………………. कमियां हर इंसान में होती है. आपने मुझे मेरी कमियां बताईं, सुधार की कोशिश करूँगा. आपका आभारी हूँ. बस इसी तरह मेल मिलाप बनाये रखें.

yamunapathak के द्वारा
May 26, 2012

आपकी कविता का सन्देश बहुत सुन्दर है. सच है जहां आपस में प्यार और विशवास है वह घर,समाज कभी दुखी नहीं रह सकता.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    परम आदरणीया यमुना पाठक जी, सादर नमन- गीत पर आपका समर्थन मिला , आपका हार्दिक आभार.

yogi sarswat के द्वारा
May 26, 2012

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो ! जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !! जितनी तारीफ़ करूँ आपके शब्दों की , उतनी ही कम है ! बहुत सुन्दर लिखते हैं आप , अंकुर जी !

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    आदरणीय योगी जी, सादर नमस्कार- गीत पर आपका समर्थन मिला , आपका हार्दिक आभार.

hina के द्वारा
May 26, 2012

सर जी नमस्ते- पूजा मन के मंदिर में ही होनी चाहिए. सुन्दर गीत के लिए मुबारकबाद.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 27, 2012

    स्नेही हिना, खुश रहो- गीत पर समर्थन के लिए आभार. अभी तुम अपनी स्टडी पर ध्यान दो.

चन्दन राय के द्वारा
May 26, 2012

अंकुर मित्र , आपके मन में जब ऐसी पूजा होगी तो कैसे ना आप के भक्ति गीत का भजन करने हम आते सुन्दर गीत

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 26, 2012

    मित्र चन्दन, गीत पर प्रतिक्रिया के लिए आभार हार्दिक आभार………………………

Rahul Nigam के द्वारा
May 26, 2012

आपकी अन्य रचनाये भी पढ़ी. : “सय्याद ने कफस को रखा चमन के पास” रचना सीधी दिल से निकली प्रतीत होती है. इस पर की हुई मेरी प्रतिक्रिया कतिपय तकनीकी कारणों से पोस्ट नहीं हो सकी. आपका स्तर निसंदेह स्तरीय है. “जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !! और “प्रेम राग हर दिशा में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो !” इसके अतिरिक्त अन्य पंक्तिया इस भाव के आस पास नहीं ठहरती पर ये रचना तबकी है जब बारहवी में पढ़ते थे तो ये सराहनीय हो सकता है पर जब आज आपसे अच्छा मिलता है तो और अच्छे के आशा होती है. आप दिल से सोचते हो अच्छा करते हो, दिल लगाते हो अच्छा करते हो पर दिल पे ले लेते हो ये अच्छा नहीं करते हो.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 26, 2012

    आदरणीय राहुल निगम जी, सादर नमस्कार- आपने मेरी भावनाओं को समझा आपका आभार…………….

pawansrivastava के द्वारा
May 25, 2012

वाह वाह !बहुत खूब ! आपके अंदाज की एक पूजा मेरी भी है.. अपनी इन चंद पंक्तियों के ज़रिये उसके बाबत थोडा बताना चाहूँगा : मेरी पूजा उस सच्चे आत्मा की जिससे मेरा अनुराग सत्य का है वह सत्य रेत की प्रचुरता के मध्य उग आये काँटों वाला मरुस्थली का अकेला पौधा सही या मछली के पीठ जैसा उज्जवल जो मुट्ठी के दबाब से फिसल कर बाहर आ जाये I

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 26, 2012

    पवन जी सादर नमस्कार- सही कहा आपने पूजा ह्रदय में मौजूद आत्मा की ही करनी चाहिए………………. साधुवाद !

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 25, 2012

हनीफ भाई, नमस्कार वास्तव में मंदिर और मस्जिद में ध्यान लगाने से ज्यादा बेहतर है की अपनी अंतरात्मा की आवाज में ध्यान लगाया जाए………मन ही तो सब कुछ है बहुत ही सुन्दर रचना ………..आप जो भी लिखते है दिल से आवाज़ आती है

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 26, 2012

    आदरणीय आनद प्रवीण जी, नमस्कार- सही कहा आपने अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना चाहिए और उसी पर अमल करना चाहिए. आभार…………………………

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

जीवन के धुंधले दर्पण में , पास न कोई दूजा हो ! मिल जाएँ सारी खुशियाँ जब, मन मंदिर में पूजा हो !!… वाह अंकुर जी .. आनन्दित कर गया आपका गीत .. उच्च कोटि का है आपका प्रयास … ह्रदय से बधाई आपको

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    महिमा श्री जी, नमस्कार- आप मेरे ब्लॉग पर आयीं, मुझे ख़ुशी हुई, रचना ने आपको आनंदित किया , इसके लिए आभार……………….

Rahul Nigam के द्वारा
May 25, 2012

ये रचना आपके स्तर की नहीं लगती.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय राहुल निगम जी, आपका आभार ……….. कि आपने रचना को पड़ा और प्रतिक्रिया व्यक्त की. महोदय, ये रचना आज से बीस साल पहले मैंने तब लिखी थी जब में बारवीं कक्षा में पड़ता था. आप मेरी अन्य रचनाये पढकर मेरे स्तर का पता लगा लीजियेगा और मुझे मेरा स्तर बता दीजियेगा. आपका आभार…………………………

jlsingh के द्वारा
May 25, 2012

प्रेम राग हर दिशि में गूंजे, हो जाये जग मतवाला ! “अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो ! बस इसके अलावा क्या चाहिए अंकुर जी, यही प्रेम का अंकुर हर दिल में हो!…

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय जवाहर जी, सादर नमस्कार- रचना पर प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत आभार…………………………….. जिस दिन प्रेम का अंकुर हर एक के दिल में अंकुरित हो जायेगा उसी दिन इस दुनिया से नफरत मिट जाएगी.

dineshaastik के द्वारा
May 25, 2012

अंकुर जी आपकी रचना पढ़कर कुछ  सवाल  मन में उठ  रहें हैं। जब हमारा मन- मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि है तो फिर  हम  क्यों ईंटों के मंदिर, मस्जित और  गिरजाघर बनाते हैं। क्या क्या निराकार, विस्तृत से भी विस्तृत तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म खुदा उसमें हर सकता है। क्या हम  उससे बड़े हो गये हैं जो उसके लिये  घर बनाने लगे। काश  इन मंदिरों, मस्जिदों और  गिरजाघरों की  जगह हम  स्कूल, अस्पताल  तथा लोगों के रहने के लिये घर बनाते तो शायद खुदा अधिक  खुश  होता। मंदिर मस्जित बनाकर तो हम खुदा का अपमान करते हैं। आओ   इस पर कुछ  विचार करें। सुन्दर काव्यात्मक  रचना के लिये बधाई…..

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय आस्तिक जी, सादर नमस्कार- आपके ह्रदय में क्या ……. ये सवाल सभी के ह्रदय में उठाना चाहिए. तभी मानवता का भला होगा. ह्रदय में नफरत पालने के न तो किसी का भला हुआ है और न होगा. यदि भगवान को प्रसन्न करना है तो उसे ह्रदय में बिठाना होगा. रचना पर समर्थन के लिए आभार………………

May 25, 2012

“अंकुर” की बस अर्ज़ यही है, घर-घर प्रेम की पूजा हो !………इसका मतलब समझते हैं आप.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय अलीन जी, सादर नमस्कार- इसका मतलब आप ज्यादा समझ सकते है. क्यूंकि आप के पास अनुभव कुछ ज्यादा ही है. …………………………. जिन लोगों की समझमे इसका मतलब आ जायेगा तो नफरत स्वतः ही समाप्त हो जाएगी. बाकी आप मुझसे ज्यादा ज्ञानी है……………… आपतो इसका कोई भी मतलब निकाल सकते हो………

    May 26, 2012

    यही तो अहम्, आपको कहए जा रहा है आपको. लिखते कुछ और हैं और दिखाते कुछ और हैं…..मैं ज्ञानी, तू ज्ञानी, मेरा, सम्मान और तेरा सम्मान ….इससे ऊपर उठकर बात करेंगे आप ………………………. और आप नफ़रत समझने औए समझने की बात करते हैं न….. संदीप जी, नमस्कार- Mohd Haneef “Ankur” के द्वारा May 23, 2012 संदीप जी, नमस्कार- मैं अपने ब्लॉग पर किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं चाहता. आपने सरिता जी की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया व्यक्त की . आप अपने ब्लॉग पर भी तो प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते थे फिर आपने मेरे ब्लॉग पर आकर प्रतिक्रिया व्यक्त क्योँ की ? आपको एक बार पहले भी मैं आगाह कर चुका हूँ की आप अपना काम कीजिये और मुझे अपना काम करने दीजिये. कृपया बार- बार मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे टेंशन देने की कोशिश मत कीजियेगा. मैं ये भली-भांति जनता हूँ की तुम किस दर्जे के लेखक हो. इसलिए निवेदन कर रहा हूँ की फिर कभी इस तरह की बात मेरे ब्लॉग पर आकर मत करना.

sinsera के द्वारा
May 25, 2012

खुबसूरत कविता अंकुर जी, मन मंदिर में पूजा हो, घर में जिस के पूजा हो…… बहुत खूब…..लेकिन किस की है पूजा…??पंकज की, प्रेम की, या अंकुर की..:-) :-)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 25, 2012

    सरिता दी बिकुल सही सवाल (ये दिमाग आपका ही हो सकता है )… ये पंकज कौन है अंकुर जी …. :)

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय सरिता जी, सादर नमस्कार- मान गये आपको, आपके दिमाग की दाद देना चाहता हूँ. ………. जो बात इस गीत में कोई नहीं पकड़ पाया उसे आपने पकड़ लिया. आज से बीस साल पहले मेरे एक मित्र ने जिसका नाम पंकज है , उसने अपनी प्रेमिका जिसका नाम पूजा है उसे आकर्षित करने के लिए मुझसे ये गीत लिखवा कर , अपनी प्रेमिका के जन्म दिन पर उसे भेंट स्वरुप दिया था. किन्तु इस गीत का सार सिर्फ ये है कि दुनिया से नफरत को मिटाने के लिए प्रेम का अंकुर हर एक के दिल में अंकुरित करना पड़ेगा.

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    महिमा श्री जी, आप सरिता जी , को धन्यवाद दीजिये… जिन्होंने मेरे गीत की गहराई में जाकर बात को पकड़ा. मैंने भी जवाव दे दिया है.

vikramjitsingh के द्वारा
May 24, 2012

अंकुर जी…..सादर… सच कहा आपने…. ”मंदिर को तोड़ डालिए….मस्जिद को ढाइए…… दिल को ना तोडिये…..ये खुदा का मुकाम है……” धन्यवाद….

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय विक्रम जीत जी, सादर नमस्कार- रचना पर प्रतिक्रिया के लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ.

RAHUL YADAV के द्वारा
May 24, 2012

हनीफ जी नमस्कार…… जीवन का सार तो यही है पूजा मन – मंदिर में ही होनी चाहिए।……सुंदर रचना

    Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
    May 24, 2012

    राहुल जी, नमस्कार- आपका हार्दिक आभार…………………..


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